प्रेम कुमार, छत्तीसगढ़: आगामी नगरीय निकाय चुनाव को लेकर भिलाई, भिलाई-चरौदा, रिसाली और बिरगांव नगर निगमों की सियासत गरमा गई है। चारों निगम फिलहाल कांग्रेस के कब्जे में हैं, जबकि प्रदेश में सत्ता की कमान भाजपा के हाथ में है। ऐसे में भाजपा इन शहरी गढ़ों में सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर रही है।
भाजपा ने चारों नगर निगमों के लिए प्रभारी और सह-प्रभारियों की नियुक्ति कर संगठन को चुनावी मोर्चे पर सक्रिय करना शुरू कर दिया है। दूसरी ओर कांग्रेस भी अपने कब्जे वाले निगमों को बचाने के लिए स्थानीय संगठन को मजबूत करने में जुटी है। इन चुनावों को दोनों दलों के बीच शहरी राजनीतिक वर्चस्व की अहम लड़ाई के तौर पर देखा जा रहा है।
चारों निगम कांग्रेस के कब्जे में
आगामी चुनाव में भिलाई, भिलाई-चरौदा, रिसाली और बिरगांव प्रमुख राजनीतिक केंद्र बने हुए हैं। चारों नगर निगमों में फिलहाल कांग्रेस का कब्जा है। कांग्रेस के सामने अपने मौजूदा प्रभाव और स्थानीय संगठन को बनाए रखने की चुनौती है। वहीं भाजपा प्रदेश की सत्ता में होने का लाभ उठाते हुए सरकार के कामकाज, संगठन की ताकत और मजबूत स्थानीय उम्मीदवारों के जरिए कांग्रेस के इन गढ़ों में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है। महापौर के साथ पार्षदों की ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतना भाजपा की रणनीति का अहम हिस्सा है।
भिलाई-चरौदा में भूपेश बघेल की प्रतिष्ठा दांव पर
भिलाई-चरौदा का चुनाव राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा चर्चा में रहने की संभावना है। यह क्षेत्र पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के प्रभाव क्षेत्र के तौर पर देखा जाता है। ऐसे में यहां का चुनाव कांग्रेस के स्थानीय संगठन के साथ-साथ भूपेश बघेल की राजनीतिक पकड़ की भी परीक्षा माना जा रहा है। यदि भाजपा कांग्रेस के कब्जे को चुनौती देने में सफल होती है, तो इसे भाजपा की महत्वपूर्ण राजनीतिक सेंध के तौर पर देखा जा सकता है। वहीं कांग्रेस की जीत भूपेश बघेल और स्थानीय संगठन के लिए मजबूत संदेश होगी।
रिसाली में ताम्रध्वज साहू की पकड़ की परीक्षा
रिसाली नगर निगम भी चुनावी लिहाज से महत्वपूर्ण है। यह इलाका पूर्व गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू के प्रभाव वाले क्षेत्र के तौर पर देखा जाता है। कांग्रेस के सामने यहां अपने पुराने राजनीतिक समीकरण और स्थानीय पकड़ को बनाए रखने की चुनौती होगी। भाजपा संगठन की ताकत और नए राजनीतिक समीकरणों के जरिए कांग्रेस के प्रभाव को चुनौती देने की कोशिश करेगी।
स्थानीय मुद्दों पर रहेगा फोकस
निकाय चुनाव में स्थानीय समस्याएं मतदाताओं के लिए सबसे अहम होती हैं। सड़क, पानी, सफाई, नाली, जल निकासी, स्ट्रीट लाइट, ट्रैफिक, आवास और रोजगार जैसे मुद्दे चुनावी बहस का हिस्सा बन सकते हैं।
भिलाई और भिलाई-चरौदा जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में रोजगार, प्रदूषण और बुनियादी सुविधाएं अहम मुद्दे हो सकते हैं। वहीं रिसाली और बिरगांव में पेयजल, सफाई, सड़क, नाली और शहरी विकास से जुड़े सवाल प्रभावी रह सकते हैं। कांग्रेस स्मार्ट मीटर, बिजली बिल और जनसमस्याओं के साथ सरकार के कामकाज को मुद्दा बनाकर भाजपा को घेरने की तैयारी में है। पार्टी सरकार पर वादाखिलाफी और जनहित के मुद्दों की अनदेखी के आरोपों को भी चुनावी मुद्दा बना सकती है।
कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर साधा निशाना
कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर का दावा है कि नगरीय निकाय चुनाव में कांग्रेस जीत हासिल करेगी। उन्होंने कहा कि जनता भाजपा के कथित अहंकार का जवाब चुनाव में देगी। कांग्रेस सरकार के ढाई साल के कार्यकाल को लेकर भी सवाल उठा रही है। पार्टी की कोशिश स्थानीय समस्याओं और सरकार के कामकाज को चुनावी मुद्दा बनाकर इन चारों निगमों में अपना कब्जा बरकरार रखने की है।
भाजपा के लिए भी लिटमस टेस्ट
प्रदेश में भाजपा सरकार होने के कारण ये निकाय चुनाव उसके लिए भी अहम परीक्षा माने जा रहे हैं। पार्टी शहरी विकास, जनसुविधाओं और सरकार की योजनाओं को लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी में है। उपमुख्यमंत्री अरुण साव का कहना है कि सरकार ने शहरी विकास और जनसुविधाओं के विस्तार के लिए लगातार काम किया है। भाजपा इन्हीं विकास कार्यों और योजनाओं को लेकर मतदाताओं के बीच पहुंचने की रणनीति बना रही है।
भाजपा ने चारों निगमों के लिए बनाई टीम
भाजपा ने चारों नगर निगमों के लिए प्रभारी और सह-प्रभारियों की नियुक्ति कर दी है। बिरगांव में सौरभ सिंह को प्रभारी, जबकि भावना बोहरा और कमल गर्ग को सह-प्रभारी बनाया गया है। भिलाई नगर निगम की जिम्मेदारी भूपेंद्र सवन्नी को दी गई है। लक्ष्मी वर्मा और चंद्रप्रकाश चंद्रवंशी सह-प्रभारी होंगे। रिसाली में अनुराग सिंहदेव प्रभारी हैं, जबकि श्वेता शर्मा और आसू चंद्रवंशी सह-प्रभारी की भूमिका निभाएंगे।
वहीं भिलाई-चरौदा की जिम्मेदारी नीलू शर्मा को दी गई है। मीनल चौबे और सूर्यकांत राठौर सह-प्रभारी बनाए गए हैं। भाजपा की रणनीति वार्ड स्तर तक संगठन को सक्रिय करने, बूथ मैनेजमेंट मजबूत करने और मजबूत स्थानीय उम्मीदवारों के जरिए कांग्रेस के गढ़ों में मुकाबला कड़ा करने की है। ऐसे में इन चारों निगमों के चुनाव दोनों प्रमुख दलों के लिए स्थानीय राजनीतिक ताकत और संगठन की वास्तविक स्थिति का बड़ा टेस्ट साबित हो सकते हैं।
