प्रेम कुमार, रायपुर: छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित झीरम घाटी हत्याकांड में 13 साल बाद अदालत का बड़ा फैसला आया है। जगदलपुर स्थित NIA कोर्ट ने मामले में सुनवाई का सामना कर रहे सभी 10 आरोपियों को दोषी करार दिया है। इस केस में कुल 11 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई हुई थी, लेकिन एक आरोपी की सुनवाई के दौरान मौत हो गई। अब बाकी 10 आरोपियों पर अदालत ने अपना फैसला सुनाया है। 25 मई 2013 को हुए इस नक्सली हमले में कांग्रेस की तत्कालीन प्रदेश स्तरीय नेतृत्व टीम समेत 32 लोगों की मौत हुई थी। दोषी करार दिए जाने के बाद अब सबकी नजर अदालत की ओर से सुनाई जाने वाली सजा पर है।
101 गवाहों के बयान और अहम दस्तावेज पेश किए गए
झीरम घाटी केस की सुनवाई लंबे समय तक चली। अभियोजन पक्ष ने आरोपों को साबित करने के लिए अदालत के सामने 101 गवाहों के बयान दर्ज कराए और कई महत्वपूर्ण दस्तावेज पेश किए। मामले में 10 अगस्त को अंतिम बहस पूरी हुई थी। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। अभियोजन पक्ष ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोप सिद्ध होने की बात कही थी, जबकि बचाव पक्ष ने आरोपों को चुनौती दी थी।
बचाव पक्ष फैसले से असंतुष्ट, हाईकोर्ट जाएगा
दोषी करार दिए गए आरोपियों की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता अरविंद चौधरी ने अदालत के फैसले पर असंतोष जताया है। उनका कहना है कि बचाव पक्ष इस फैसले से संतुष्ट नहीं है और इसके खिलाफ हाईकोर्ट का रुख करेगा। ऐसे में 13 साल पुराने इस मामले में कानूनी लड़ाई आगे भी जारी रहने की संभावना है।
झीरम केस की जांच पर भूपेश बघेल उठाते रहे हैं सवाल
झीरम घाटी हत्याकांड की जांच को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पहले भी सवाल उठा चुके हैं। उनका आरोप रहा है कि NIA की जांच कथित साजिश के पीछे मौजूद लोगों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुंच सकी। बघेल का दावा था कि दरभा थाने में दर्ज FIR में नामजद लोगों से पूछताछ नहीं की गई। उन्होंने यह भी कहा था कि अदालत के निर्देश के बावजूद गुडसा उसेंडी का बयान दर्ज नहीं किया गया। उनके मुताबिक, झीरम हमले के पीछे कथित साजिश में शामिल लोगों तक पहुंचना जरूरी था। उन्होंने यह भी कहा था कि अगर जांच सही तरीके से नहीं हुई है तो अदालत उपलब्ध जांच और साक्ष्यों के आधार पर ही फैसला करेगी।
SIT की जांच को लेकर भी हुआ था विवाद
झीरम घाटी मामले की जांच के लिए राज्य सरकार ने SIT का गठन किया था। बघेल के अनुसार, NIA ने SIT की जांच को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। इसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। झीरम केस की जांच को लेकर एजेंसियों के बीच अधिकार और जांच की दिशा को लेकर भी लंबे समय तक विवाद बना रहा।
25 मई 2013 को झीरम घाटी में क्या हुआ था?
परिवर्तन यात्रा के बाद जगदलपुर लौट रहा था कांग्रेस का काफिला
साल 2013 में छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने प्रदेश में परिवर्तन यात्रा शुरू की थी। 25 मई को सुकमा में रैली के बाद कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं का काफिला जगदलपुर की ओर रवाना हुआ था। काफिले में करीब 25 गाड़ियां और लगभग 200 नेता-कार्यकर्ता शामिल थे। इसमें तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, महेंद्र कर्मा, कवासी लखमा और बस्तर के कांग्रेस प्रभारी उदय मुदलियार समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे।
झीरम घाटी में रोका गया काफिला
दोपहर करीब 3:40 बजे काफिला झीरम घाटी पहुंचा। इसी दौरान सड़क पर पेड़ गिराकर रास्ता बाधित किया गया। काफिला रुकते ही हथियारबंद नक्सलियों ने हमला कर दिया। बताया गया था कि बड़ी संख्या में नक्सलियों ने काफिले को घेर लिया और गोलीबारी शुरू कर दी। करीब डेढ़ घंटे तक हमला चला।
नंदकुमार पटेल और महेंद्र कर्मा समेत कई नेताओं की मौत
हमले में तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश पटेल की मौत हो गई। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता महेंद्र कर्मा और उदय मुदलियार समेत कई अन्य लोगों ने भी जान गंवाई। महेंद्र कर्मा को नक्सलियों का प्रमुख विरोधी माना जाता था। वह सलवा जुडूम आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे थे। इसी वजह से उन्हें हमले में विशेष निशाना बनाए जाने की बात सामने आई थी।
हमले में 32 लोगों की गई थी जान
25 मई 2013 का झीरम घाटी हमला छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े राजनीतिक-नक्सली हमलों में शामिल है। इस हमले में कांग्रेस नेताओं, कार्यकर्ताओं और सुरक्षाकर्मियों समेत 32 लोगों की मौत हुई थी। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था और इसके बाद झीरम घाटी हत्याकांड की जांच लंबे समय तक चर्चा और विवाद का विषय बनी रही।
अब सजा के ऐलान का इंतजार
13 साल बाद 10 आरोपियों को दोषी करार दिए जाने के बाद अब मामले में अगली नजर सजा के ऐलान पर है। वहीं बचाव पक्ष ने फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने की बात कही है। झीरम घाटी केस के इस फैसले के बाद 25 मई 2013 के हमले की पूरी साजिश और सभी कथित जिम्मेदार लोगों तक जांच की पहुंच को लेकर उठते रहे सवाल एक बार फिर चर्चा में हैं।
